पंतनगर ...
कुछ यादें बाकी हैं अब भी बीत गए उन सालों की
रौशन चेहरा पापा का और मां के लम्बे काले बालों की
अटल हिमालय के आँगन में एक बड़ा अहाता था
विश्व विख्यात विद्यालय था जो पंतनगर कहलाता था
कैम्पस में रहने वाले हम कैम्पस स्कूल ही जाते थे
बस की भागमदौड़ नहीं बस पैडल ही मारे जाते थे
सुबह सुन्दर आनंदित करती दोपहर आराम कराती थी
सुनहले गेंहू की गोल रोटियां मां गरम गरम खिलाती थी
फ़िक्र बंद थे फ़िक्रमंद नहीं सो आराम से हम सो जाते थे
यार दोस्तों को चैन कहाँ बैट बौल के साथ उठाते थे
बिना काम के व्यस्त बड़े थे पर शाम ढले घर आते थे
क्योंकि अक्सर पापा हाट से रामेश्वर के गरम समोसे लाते थे
पता नहीं क्यों समोसों में तब फैट नहीं पाया जाता था
दूध भी घर पर डबल मलाई वाला ही मंगवाया जाता था
आर्गेनिक थीं सभी सब्जियां चाव से खायी जाती थीं
स्ट्रैस जैसी कठिन बीमारियाँ वहां नहीं पायी जाती थी
बगल में रहते बंगाली अंकल रोचक किस्से सुनाते थे
काजी अंकल होली पर सबसे पहले चंदा दे कर जाते थे
“तारक मेहता का उल्टा चश्मा” जैसा वो गोकुल धाम था
पंतनगर पावन अति प्यारा सुन्दर सकल सुख धाम था
ट्रैफिक सिग्नल की लाइट नहीं थी बिना बात की फाइट नहीं थी
टेंशन की कोई साईट नहीं थी , कम पैसों में भी हालत टाईट नहीं थी
पीज़ा हट की बाईट नहीं थी कुछ रास्तों पर भी लाईट नहीं थी
फिर भी अक्सर अँधेरे में जब टहलने घंटा घर को जाते थे
ऊपर तारे नीचे जुगनू हाथ पकड़ ले जाते थे
पर अब चौबीस घंटे लाईट में भी अक्सर अँधेरा हो जाता है
कल तो दिखता ही नहीं और आज भी धुंधला सा ही नज़र आता है
शहर की भागम भाग बड़ी है समय के साथ जंग छिड़ी है
हर एक समस्या बहुत बड़ी है मुश्किल दिखती हर घड़ी है
क्योंकि जो है उसका संतोष नहीं है, खुशीयों का कोष नहीं है
कहाँ हैं इसका होश नहीं हैं , जीने का वो जोश नहीं है
बस निन्यानवे का फेर सभी को चक्रव्यूह सा घुमाता है
मां का वो निर्मल आँचल हर दिन याद आता है
लम्बी छुट्टीयों की प्रतीक्षा में
-अनूप चतुर्वेदी
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