सिस्टम को ऐसे इंसान चाहिए जो सवाल न पूछें
विडंबना यह है कि आज सूचना का विस्फोट है,
पर आत्मचिंतन का अकाल। लोग ब्रह्मांड की खबरें पढ़ते हैं,
पर अपने भीतर झाँकने से डरते हैं। आज का श्रमिक केवल श्रम नहीं बेच रहा—
वह अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपनी चेतना बेच रहा है। दिन भर मशीन की तरह काम
● थका हुआ शरीर ● सस्ता मनोरंजन ● नींद
→ फिर वही चक्र।
इस ढाँचे में आत्मचिंतन के लिए कोई जगह छोड़ी ही नहीं गई।
सिस्टम को ऐसे इंसान चाहिए, जो सवाल न पूछें,
थके रहें, और खाली समय में सोचें नहीं—बस खपत करें।
इसीलिए एंटरटेनमेंट को आराम के रूप में नहीं, डिस्ट्रैक्शन के रूप में डिज़ाइन किया गया है।
यह सुख नहीं देता, यह सुन्न करता है— ताकि आदमी अपने दर्द, अपने प्रश्न
और अपने उद्देश्य से भागता रहे। श्रमिक को उतना ही दिया जाता है
कि वह टूटे नहीं, लेकिन इतना कभी नहीं कि वह जाग जाए।
और इसी कारण आत्मचिंतन आज एक लक्ज़री बना दिया गया है—
जो केवल वही कर सकता है जिसके पास समय है, ऊर्जा है और सबसे ज़रूरी—डर से आज़ादी।
फिर भी इतिहास गवाह है— चेतना हमेशा
सबसे कठिन परिस्थितियों में ही जन्म लेती है।
— #SumitMonss के ब्लॉग से #सच्चाई #आत्मचिंतन
#SystemTruth #Consciousness
पर आत्मचिंतन का अकाल। लोग ब्रह्मांड की खबरें पढ़ते हैं,
पर अपने भीतर झाँकने से डरते हैं। आज का श्रमिक केवल श्रम नहीं बेच रहा—
वह अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपनी चेतना बेच रहा है। दिन भर मशीन की तरह काम
● थका हुआ शरीर ● सस्ता मनोरंजन ● नींद
→ फिर वही चक्र।
इस ढाँचे में आत्मचिंतन के लिए कोई जगह छोड़ी ही नहीं गई।
सिस्टम को ऐसे इंसान चाहिए, जो सवाल न पूछें,
थके रहें, और खाली समय में सोचें नहीं—बस खपत करें।
इसीलिए एंटरटेनमेंट को आराम के रूप में नहीं, डिस्ट्रैक्शन के रूप में डिज़ाइन किया गया है।
यह सुख नहीं देता, यह सुन्न करता है— ताकि आदमी अपने दर्द, अपने प्रश्न
और अपने उद्देश्य से भागता रहे। श्रमिक को उतना ही दिया जाता है
कि वह टूटे नहीं, लेकिन इतना कभी नहीं कि वह जाग जाए।
और इसी कारण आत्मचिंतन आज एक लक्ज़री बना दिया गया है—
जो केवल वही कर सकता है जिसके पास समय है, ऊर्जा है और सबसे ज़रूरी—डर से आज़ादी।
फिर भी इतिहास गवाह है— चेतना हमेशा
सबसे कठिन परिस्थितियों में ही जन्म लेती है।
#SystemTruth #Consciousness