भक्ति का माप बाहरी चिह्न नहीं, भीतरी पवित्रता है -चरित्रवान बनो।
सिर्फ कंठी पहन लेने या दीक्षा ले लेने से कोई सच्चा भक्त नहीं बनता। अगर जीवन में तामसिक भोजन है (जो रजोगुण और तमोगुण को बढ़ाता है), गलत और अनैतिक रिश्ते हैं — चाहे वो शादीशुदा हों या किसी भी मर्यादा के विरुद्ध — और आचरण शुद्ध नहीं है, तो आपकी दीक्षा केवल एक दिखावा बनकर रह जाती है। जो लोग दिखावे के लिए 'राधा-राधा' बोलने वाली काउंट मशीनें और भक्तिभाव के नाम पर खिलौने साथ लेकर घूमते हैं — समझ लें कि इन बाहरी चीज़ों से आत्मा नहीं जुड़ती।
धर्म का सार मशीन में नहीं, मन की मौन गहराई में है।
धर्म बाहरी चिह्नों से नहीं, भीतर की पवित्रता, संयम और शुद्ध विचारों से पहचाना जाता है।
दीक्षा तभी सार्थक होती है जब वह जीवन में उतरे
— आचरण, भोजन, दृष्टिकोण और संबंधों में शुद्धता बनाकर।
सुधरना है तो भीतर से सुधरो — वरना ये कंठी तोड़कर फेंक दो।
धर्म कोई दिखाने की वस्तु नहीं, जीने का मार्ग है।"
No comments:
Post a Comment