स्वामी जी की पुस्तक कर्मयोग की कुछ महत्वपूर्ण बाते -
- हमें कर्म करने का ही अधिकार है ,कर्म फल मे हमारा कोई अधिकार नही | कर्मफलों को एक और रहने दो,उसकी चिन्ता हमें क्यों हो ?
- प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे अपने जीवन मे ढालने का प्रयत्न करे | बजाय इसके कि वह दूसरों के आदर्श को लेकर चरित्र गढ़ने की चेष्टा करे,अपने ही आदर्श का अनुसरण करना सफलता का अधिक निशिचत मार्ग है |
- किसी समाज के सब स्त्री - पुरुष न एक मन के होते है ,न एक ही योग्यता के और न ही एक शक्ति के । सब अपने अपने कार्यक्षेत्र मे बड़े है |
- यह कहना व्यर्थ है कि गृहस्थ से संन्यासी क्षेष्ठ है | संसार को छोड़कर,स्वच्छन्द और शान्त जीवन मे रहकर ईश्वरोपासना करने की अपेक्षा संसार मे रहते हुए ईश्वर की उपासना करना बहुत कठिन है |
- देखिये, प्रथम बिंदु में स्वामी जी कर्म को प्रधान बताते है | और आज के लोग परिणाम देखना चाहते है बस धैर्य किसी के पास नहीं है |
- द्वितीय, बिंदु मे स्वामी जी बोलते है आप जो है वो ही आप रहिए किस का भी अनुकरण मत करो किन्तु आज कल लोग दूसरों की तरह बनना चाहते है और यही उनके पतन का कारन है |
- तृतीय, बिंदु मे स्वामी जी बोलते है, सब अपने-अपने कार्यक्षेत्र मैं बड़े है | पर फिर भी आज स्त्री -पुरुष से होड़ कर रही है और पुरुष स्त्री से |
- अंतिम बिंदु मे स्वामी जी गृहस्थ और संन्यासी दोनों को अपने अपने क्षेत्र मे श्रेष्ठ बताते है फिर भी हम आज गृहस्थ जीवन मे ईश्वर प्राप्ति को असम्भव मानते है और यही हमारे दुःख का कारन है |
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